मैं सिगरेट को हथेली पर
उलटकर पहले खाली करता हूँ
फिर तेरे दिए जख़म दालकर मिलाकर
लगा के अपने होठो से
अपने मोहबत की आग से जलाता हूँ
तेरे दिए हर एक गम को सुलगा के सिगरेट में
हर के दर्द को धुएं उड़ाता हूँ
तेरे मोहबत के नशे में खो जाता हूँ
अब ये तर्कीब रोज अपनाता हूँ
खुद को और तेरी याद को हर रोज एक साथ जलता हूँ
दर्द होता है दिल में लेकिन
जब उठे धुएं में तेरी एक जलक पाता हूँ
थोड़ा मुस्कुरा जाता हूँ
अब ये तरकीब आदतो में शुमार
तेरी याद को युही जलाता हूँ
युही धुएं में उड़ाता हूँ
युही मुस्कुरा जाता हूँ .………………
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